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shishusharma


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सामाजिक बदलाव में द्धंद की राह पर मानवाधिकार कानून।

Posted On: 17 Mar, 2011  
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नौकरी चाहिये तो जेल जाने की योग्‍यता हासिल करो।

Posted On: 2 Mar, 2011  
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अंधे लोंगों का औंधा विकास

Posted On: 1 Feb, 2011  
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अपराधों में भी आरक्षण है क्‍या !

Posted On: 14 Jan, 2011  
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पत्रकार जात–एक गेंदा फूल

Posted On: 11 Jan, 2011  
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टाइगर के सिगनेचर-जिम कार्बेट पार्क

Posted On: 25 Dec, 2010  
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बेचारी राडिया से रार क्‍यों ।

Posted On: 21 Dec, 2010  
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के द्वारा: NIKHIL PANDEY NIKHIL PANDEY

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शिशु शर्मा जी बेहतरीन जानकारी के लिये बधाई । अभी जो परिस्थितियां चल रही हैं, उसमें ये मुद्दा बड़ा विवादास्पद मोड़ पर है । कश्मीर आदि में जो स्थिति है, अगर उसमें हम सुरक्षाबलों के मनोबल के साथ ज़रा भी छेड़छाड़ करते हैं, तो निश्चित ही हमें लेने के देने पड़ जाने वाले हैं । हमारी स्थिति वहां ठीक इस क्षण बड़ी ही विकट और शोचनीय है । आपका यह कथन बिल्कुल सत्य है कि कुछ मामलों में ज़्यादतियां होने की सम्भावनाएं होती ही हैं । लेकिन यहां समस्या राष्ट्र की अस्मिता और अखंडता की है । कल जंक्शन के जागरण ब्लाँग 'भेजे में गोली मार' लेख की टिप्पणियों में हमारे मंच के दो विद्वान और वरिष्ठ पत्रकारगण के बीच बहुत ही प्रबुद्ध बहस इसी मुद्दे पर हुई है । दोनों के ही तर्क़ अकाट्य हैं, लेकिन बात वहीं आ जाती है कि ठीक इस समय हमारी प्राथमिकताएं क्या होनी चाहिये । राष्ट्रीय अखंडता की सुरक्षा, या मनवाधिकारों की बातें, जिनपर हम बाद के सामान्य समय में भी बहस चलाकर उचित निर्णय ले पाने की स्थिति में होंगे ।

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लेखक ने 73 वें संविधान संशोधन के बाद की पंचायत राज व्यवस्था पर काफी सटीक और व्यावहारिक विवेचना प्रस्तुत की है। यदि इस संशोधन में पंचायत राज के प्रतिनिधियों के पदनामों की एकरूपता पर भी ध्यान दिया गया होता तो देशभर के लोगों के लिये इसे समझना आसान रहता। सम्भवत: आपने उत्तर प्रदेश को सामने रखकर आलेख लिखा है। जहाँ पर ग्राम पंचायत के मुखिया को प्रधान कहा जाता है, जबकि क्षेत्रफल की दृष्टि से देश के सबसे बडे राज्य राजस्थान में ग्राम पंचायत के मुखिया को सरपंच कहा जाता है। प्रधान पंचायत समिति के मुखिया को कहते हैं, जिसे तहसील/ब्लॉक स्तर पर चुना जाता है। मध्य प्रदेश एवं छत्तीसगढ में भी राजस्थान की ही भांति ग्राम पंचायत के मुखिया को तो सरपंच कहा जाता है, लेकिन वहाँ पर प्रधान शब्द है ही नहीं। पंचायत समित प्रमुख को वहाँ पर जनपद पंचायत अध्यक्ष कहा जाता है। जिला पंचायत स्तर के मुखिया को जिला पंचायत अध्यक्ष कहा जाता है, जबकि राजस्थान में जिला पंचायत प्रमुख को जिला प्रमुख कहा जाता है। उ. प्र. के बारे में आपसे जानकारी की अपेक्षा है। यह विवेचन इसलिये कि आपके आलेख को उ. प्र. के बाहर के पाठकों को पढने पर भ्रम पैदा हो सकता है, क्योंकि राजस्थान में तो प्रधान विधायक के ही समतुल्य होता है। उसका कार्यक्षेत्र भी विधायक के ही समान और अनेक मामलों में तो अधिक भी होता है। जहाँ तक मनरेगा या अन्य तरीकों से प्राप्त होने वाले बजट के दुष्परिणामों की बात है तो हर राज्य में जहाँ-जहाँ पर धन आता है, वहाँ-वहाँ पर भ्रष्टाचार, अत्याचार, कालाबाजारी, कमीशनखोरी आदि अपराध बढे हैं, जिसके दुष्परिणामस्वरूप शराब, शबाब, मांसाहार आदि दिखना स्वाभाविक है। हमारे देश में भ्रष्टाचार का ग्राफ तेजी से बढ रहा है, जो हर अच्छाई को तहस-नहस कर रहा है। चाहे हम पंचायतों को अधिकार दें या किसी अन्य निकाय को जब तक इस देश में भ्रष्टाचार पर अंकुश नहीं लगेगा, तब तक बहुत मुश्किल है कि आम व्यक्ति को न्याय मिल सके और लोकतन्त्र की मंशा पूर्ण हो सके। आपकी बात तकनीकी नजर से देखें तो ठीक है कि खुशहाली चाहे चन्द लोगों तक ही पहुँची हो, लेकिन आम व्यक्ति राजनैतिक रूप से जागरूक जरूर हुआ है। सच में इसे जागरूकता कहना ठीक नहीं है। जागरूक लोग शराब के बदले वोट नहीं देते हैं। जागरूक लोग ग्राम सभाओं में लिये जाने वाले निर्णयों पर ग्राम पंचायत प्रमुख सरपंच (प्रधान) के कहे अनुसार अंगूठा नहीं लगाते है। कडवा सच तो यह है कि जिस समय पंचायत राज की कल्पना की गयी थी, उस समय गाँवों में यह कहावत प्रचलित थी कि पंच परमेश्वर होता है, जो सिर्फ न्याय करता है। लेकिन 73 वें संविधान संशोधन तक 1 रुपये में से 15 पैसे गाँव तक पहुँचने की स्थिति पैदा हो गयी थी। पंच परमेश्वर कहलाने वाली पीढी समाप्त हो गयी थी और अब तो भ्रष्ट एवं पतित लोगों के चंगुल में फंसकर पंचायत राज व्यवस्था दिन-प्रतिदिन ग्राम स्तर तक देश को भ्रष्टतम बनाने का औजार बनती जा रही है। यदि मेरी बात को अन्यथा नहीं लें तो उच्च स्तर के राजनेताओं ने सत्ता में भागीदारी के नाम पर भ्रष्टाचार में भागीदारी प्रदान करने का पंचायत स्तर पर मनरेगा जैसा कार्यक्रम प्रारम्भ किया है, जो देश की काया पलट सकता था, लेकिन देश के चरित्र को तहस नहस कर रहा है! शुभकामनाओं सहित। शुभाकांक्षी डॉ. पुरुषोत्तम मीणा \'निरंकुश\' राष्ट्रीय अध्यक्ष-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास) एवं सम्पादक-प्रेसपालिका (जयपुर से प्रकाशित हिन्दी पाक्षिक)

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जिन्दा लोगों की तलाश! मर्जी आपकी, आग्रह हमारा!! काले अंग्रेजों के विरुद्ध जारी संघर्ष को आगे बढाने के लिये, यह टिप्पणी प्रदर्शित होती रहे, आपका इतना सहयोग मिल सके तो भी कम नहीं होगा। =0=0=0=0=0=0=0=0=0=0=0=0=0=0=0=0= सच में इस देश को जिन्दा लोगों की तलाश है। सागर की तलाश में हम सिर्फ बूंद मात्र हैं, लेकिन सागर बूंद को नकार नहीं सकता। बूंद के बिना सागर को कोई फर्क नहीं पडता हो, लेकिन बूंद का सागर के बिना कोई अस्तित्व नहीं है। सागर में मिलन की दुरूह राह में आप सहित प्रत्येक संवेदनशील व्यक्ति का सहयोग जरूरी है। यदि यह टिप्पणी प्रदर्शित होगी तो विचार की यात्रा में आप भी सारथी बन जायेंगे। हमें ऐसे जिन्दा लोगों की तलाश हैं, जिनके दिल में भगत सिंह जैसा जज्बा तो हो, लेकिन इस जज्बे की आग से अपने आपको जलने से बचाने की समझ भी हो, क्योंकि जोश में भगत सिंह ने यही नासमझी की थी। जिसका दुःख आने वाली पीढियों को सदैव सताता रहेगा। गौरे अंग्रेजों के खिलाफ भगत सिंह, सुभाष चन्द्र बोस, असफाकउल्लाह खाँ, चन्द्र शेखर आजाद जैसे असंख्य आजादी के दीवानों की भांति अलख जगाने वाले समर्पित और जिन्दादिल लोगों की आज के काले अंग्रेजों के आतंक के खिलाफ बुद्धिमतापूर्ण तरीके से लडने हेतु तलाश है। इस देश में कानून का संरक्षण प्राप्त गुण्डों का राज कायम हो चुका है। सरकार द्वारा देश का विकास एवं उत्थान करने व जवाबदेह प्रशासनिक ढांचा खडा करने के लिये, हमसे हजारों तरीकों से टेक्स वूसला जाता है, लेकिन राजनेताओं के साथ-साथ अफसरशाही ने इस देश को खोखला और लोकतन्त्र को पंगु बना दिया गया है। अफसर, जिन्हें संविधान में लोक सेवक (जनता के नौकर) कहा गया है, हकीकत में जनता के स्वामी बन बैठे हैं। सरकारी धन को डकारना और जनता पर अत्याचार करना इन्होंने कानूनी अधिकार समझ लिया है। कुछ स्वार्थी लोग इनका साथ देकर देश की अस्सी प्रतिशत जनता का कदम-कदम पर शोषण एवं तिरस्कार कर रहे हैं। आज देश में भूख, चोरी, डकैती, मिलावट, जासूसी, नक्सलवाद, कालाबाजारी, मंहगाई आदि जो कुछ भी गैर-कानूनी ताण्डव हो रहा है, उसका सबसे बडा कारण है, भ्रष्ट एवं बेलगाम अफसरशाही द्वारा सत्ता का मनमाना दुरुपयोग करके भी कानून के शिकंजे बच निकलना। शहीद-ए-आजम भगत सिंह के आदर्शों को सामने रखकर 1993 में स्थापित-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास)-के 17 राज्यों में सेवारत 4300 से अधिक रजिस्टर्ड आजीवन सदस्यों की ओर से दूसरा सवाल- सरकारी कुर्सी पर बैठकर, भेदभाव, मनमानी, भ्रष्टाचार, अत्याचार, शोषण और गैर-कानूनी काम करने वाले लोक सेवकों को भारतीय दण्ड विधानों के तहत कठोर सजा नहीं मिलने के कारण आम व्यक्ति की प्रगति में रुकावट एवं देश की एकता, शान्ति, सम्प्रभुता और धर्म-निरपेक्षता को लगातार खतरा पैदा हो रहा है! अब हम स्वयं से पूछें कि-हम हमारे इन नौकरों (लोक सेवकों) को यों हीं कब तक सहते रहेंगे? जो भी व्यक्ति इस जनान्दोलन से जुडना चाहें, उसका स्वागत है और निःशुल्क सदस्यता फार्म प्राप्ति हेतु लिखें :- (सीधे नहीं जुड़ सकने वाले मित्रजन भ्रष्टाचार एवं अत्याचार से बचाव तथा निवारण हेतु उपयोगी कानूनी जानकारी/सुझाव भेज कर सहयोग कर सकते हैं) डॉ. पुरुषोत्तम मीणा राष्ट्रीय अध्यक्ष भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास) राष्ट्रीय अध्यक्ष का कार्यालय 7, तँवर कॉलोनी, खातीपुरा रोड, जयपुर-302006 (राजस्थान) फोन : 0141-2222225 (सायं : 7 से 8) मो. 098285-02666 E-mail : dr.purushottammeena@yahoo.in

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जिन्दा लोगों की तलाश! मर्जी आपकी, आग्रह हमारा!! काले अंग्रेजों के विरुद्ध जारी संघर्ष को आगे बढाने के लिये, यह टिप्पणी प्रदर्शित होती रहे, आपका इतना सहयोग मिल सके तो भी कम नहीं होगा। =0=0=0=0=0=0=0=0=0=0=0=0=0=0=0=0= सच में इस देश को जिन्दा लोगों की तलाश है। सागर की तलाश में हम सिर्फ बूंद मात्र हैं, लेकिन सागर बूंद को नकार नहीं सकता। बूंद के बिना सागर को कोई फर्क नहीं पडता हो, लेकिन बूंद का सागर के बिना कोई अस्तित्व नहीं है। सागर में मिलन की दुरूह राह में आप सहित प्रत्येक संवेदनशील व्यक्ति का सहयोग जरूरी है। यदि यह टिप्पणी प्रदर्शित होगी तो विचार की यात्रा में आप भी सारथी बन जायेंगे। हमें ऐसे जिन्दा लोगों की तलाश हैं, जिनके दिल में भगत सिंह जैसा जज्बा तो हो, लेकिन इस जज्बे की आग से अपने आपको जलने से बचाने की समझ भी हो, क्योंकि जोश में भगत सिंह ने यही नासमझी की थी। जिसका दुःख आने वाली पीढियों को सदैव सताता रहेगा। गौरे अंग्रेजों के खिलाफ भगत सिंह, सुभाष चन्द्र बोस, असफाकउल्लाह खाँ, चन्द्र शेखर आजाद जैसे असंख्य आजादी के दीवानों की भांति अलख जगाने वाले समर्पित और जिन्दादिल लोगों की आज के काले अंग्रेजों के आतंक के खिलाफ बुद्धिमतापूर्ण तरीके से लडने हेतु तलाश है। इस देश में कानून का संरक्षण प्राप्त गुण्डों का राज कायम हो चुका है। सरकार द्वारा देश का विकास एवं उत्थान करने व जवाबदेह प्रशासनिक ढांचा खडा करने के लिये, हमसे हजारों तरीकों से टेक्स वूसला जाता है, लेकिन राजनेताओं के साथ-साथ अफसरशाही ने इस देश को खोखला और लोकतन्त्र को पंगु बना दिया गया है। अफसर, जिन्हें संविधान में लोक सेवक (जनता के नौकर) कहा गया है, हकीकत में जनता के स्वामी बन बैठे हैं। सरकारी धन को डकारना और जनता पर अत्याचार करना इन्होंने कानूनी अधिकार समझ लिया है। कुछ स्वार्थी लोग इनका साथ देकर देश की अस्सी प्रतिशत जनता का कदम-कदम पर शोषण एवं तिरस्कार कर रहे हैं। आज देश में भूख, चोरी, डकैती, मिलावट, जासूसी, नक्सलवाद, कालाबाजारी, मंहगाई आदि जो कुछ भी गैर-कानूनी ताण्डव हो रहा है, उसका सबसे बडा कारण है, भ्रष्ट एवं बेलगाम अफसरशाही द्वारा सत्ता का मनमाना दुरुपयोग करके भी कानून के शिकंजे बच निकलना। शहीद-ए-आजम भगत सिंह के आदर्शों को सामने रखकर 1993 में स्थापित-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास)-के 17 राज्यों में सेवारत 4300 से अधिक रजिस्टर्ड आजीवन सदस्यों की ओर से दूसरा सवाल- सरकारी कुर्सी पर बैठकर, भेदभाव, मनमानी, भ्रष्टाचार, अत्याचार, शोषण और गैर-कानूनी काम करने वाले लोक सेवकों को भारतीय दण्ड विधानों के तहत कठोर सजा नहीं मिलने के कारण आम व्यक्ति की प्रगति में रुकावट एवं देश की एकता, शान्ति, सम्प्रभुता और धर्म-निरपेक्षता को लगातार खतरा पैदा हो रहा है! अब हम स्वयं से पूछें कि-हम हमारे इन नौकरों (लोक सेवकों) को यों हीं कब तक सहते रहेंगे? जो भी व्यक्ति इस जनान्दोलन से जुडना चाहें, उसका स्वागत है और निःशुल्क सदस्यता फार्म प्राप्ति हेतु लिखें :- (सीधे नहीं जुड़ सकने वाले मित्रजन भ्रष्टाचार एवं अत्याचार से बचाव तथा निवारण हेतु उपयोगी कानूनी जानकारी/सुझाव भेज कर सहयोग कर सकते हैं) डॉ. पुरुषोत्तम मीणा राष्ट्रीय अध्यक्ष भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास) राष्ट्रीय अध्यक्ष का कार्यालय 7, तँवर कॉलोनी, खातीपुरा रोड, जयपुर-302006 (राजस्थान) फोन : 0141-2222225 (सायं : 7 से 8) मो. 098285-02666 E-mail : dr.purushottammeena@yahoo.in

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मान्यवर शिशुशर्मा जी, आपने कहा है कि हमें यह तय करना भी जरूरी है कि इस देश का संविधान सबको समान मौलिक अध‍िकारों की व्‍यवस्‍था करता है. यानी आप आतंकियों के मौलिक अधिकार की बात कर रहे हैं. आप चाहते हैं कि आतंकी भारतीयों को मारते रहें और आप जैसे समर्थको के कारण बच भी निकलें. आप जैसों के कारण ही अभी तक अफजल जेल में बिरयानी खा रहा है, हजरतबल दरगाह में आप जैसे हिमायतियों के कारण आतंकी सब आनंद भोगते रहे, देश कुछ नहीं कर सका. जिस देश में भीतर ही गद्दारों की फौज मौजूद हो वहाँ बाहरी आक्रमण की क्या जरूरत? अब आप यह भी बता दें कि नक्सलियों की और क्या सेवा की जाए जिससे आप जैसों की आत्मा तृप्त हो सके. अभी तो नक्सली आम जनता की बहू-बेटियों से बलात्कार ही कर रहे हैं, बन्दूक की नोक पर अपने पक्ष में बोलने के लिए मजबूर कर रहे हैं और एक प्रकार की समानांतर सरकार चला रहे हैं. अब और क्या चाहिए आप लोगों को?

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शिशु जी आप ने काफी अच्छा लिखा है लेकिन मैं एक बात और कहना छठा हूँ कि जब भी हम आर्कसन कि बात करते हैं तो केवेल दलितों के लिए ही क्यों. मेरे ख्याल से तो अर्कसन सभी जरूरत मंदों को मिलना चाहिए चाहे फिर वो कोई दलित हो या स्वर्ण. मैं ऐसे बहुत से सवर्णों को जनता हूँ जो कि अपनी रोज मर्रा कि जरूरतों के लिए संघर्स कर रहे है.पहली बात तो उनके बच्चे धन के अभाव में पढ़ नहीं पते और अगर किसी तरह से पढ़ भी लेते हैं तो उनेह नोकरी नहीं मिल पाती. दूसरी और वो दलित जिनके पास पैसे कि कोई कमी नहीं उनके बच्चे अरकसन के चलते आसानी से नोकरी प् जाते हैं. इस सब के चलते सवर्णों और दलितों के बीच जो खायी थी वो और बढ़ गयी है.

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के द्वारा: Arunesh Mishra Arunesh Mishra

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